Israel Palestine conflict : भारत क्यों इजरायल का खुलकर समर्थन नहीं कर सकता

Israel Palestine conflict : भारत क्यों इजरायल का खुलकर समर्थन नहीं कर सकता

Israel Palestine conflict

Israel Palestine conflict ; इजरायल और फिलीस्तीन के बीच पिछले कई दिनों से संघर्ष जारी है। दोनों तरफ से लोग मारे जा रहे हैं , और अब तक 3000 से ज्यादा लोगों के मारे जाने की खबरें सामने आ रही है। इस Middle-East देशों के संघर्ष ने पूरी दुनिया को दो खेमों में बांट दिया है। एक तरफ इस्लाम समर्थित देश (Arab Country,Pakistan,Turkey Iran,Algeria etc) है तो दूसरी तरफ गैर इस्लामी मुल्क!
पिछले दिन इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू ने , अपने tweet के माध्यम से उन सभी देशों को शुक्रिया अदा किया, जिन्होंने सीधे तौर पर इजरायल का समर्थन किया । अपने tweet में उन्होंने उन देशों के झंडे भी साझा किए, लेकिन उसमें भारत का झंडा कहीं नजर नहीं आया । जिसके बाद भारतीय Social Media Users के बीच इस मुद्दे को लेकर बहस शुरू हो गई और कई तरह के सवाल पूछे जाने लगे। सबसे बड़ा सवाल यह पूछे जाने लगा कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू के tweet में भारत के झंडे क्यों नहीं थे ? और भारत इजराइल का समर्थन क्यों नहीं कर रहा है ?
आपके भी मन में इसको लेकर कई सवाल उठ रहे होंगे । आज के पोस्ट में, मैं आपको सिलसिलेवार तरीके से सारे सवालों के जवाब देने का प्रयास करूंगा और बताने की कोशिश करूंगा कि क्यों भारत इजरायल का खुले तौर पर समर्थन नहीं कर सकता !

Israel Palestine conflict

इजरायल और फिलिस्तीन के बीच युद्ध की वजह

World War II से पहले Israel नाम का कोई देश World map पर मौजूद ही नहीं थी। world War 2′ के बाद मित्र राष्ट्रों , खासकर अमेरिका और इंग्लैंड ने इजराइल की स्थापना 1948 में फिलिस्तीन के क्षेत्रों पर कब्जा करके किया । इसके बाद फिलिस्तीन और इजराइल के बीच में संघर्ष लगातार होते रहे

Historically relation between India and Palestine

भारत और फिलीस्तीन के बीच वर्ल्ड वॉर सेकंड के समय से ही गहरे रिश्ते रहे हैं। हम सब जानते हैं कि, सोवियत यूनियन (soviet Union) वर्तमान के रूस के साथ भारत के तालुकात काफी पुराने हैं। जहां एक तरफ रूस फिलिस्तीन का समर्थन करता है तो दूसरी तरफ अमेरिका इजराइल के समर्थन में खड़ा रहता है। जिसके वजह से भारत सरकार की रणनीतियां हमेशा से Pro Palestine रही है। सोवियत यूनियन के विघटन के बाद परिस्थितियां बदल गई और भारत सरकार की नीतियां रूस की तरफ से मुड़कर अमेरिका और European Union की तरफ हो थी। धीरे धीरे भारत के रिश्ते इजराइल के साथ अच्छे होने लगे, लेकिन हमारी हमेशा से यह नीति रही है कि हम अपने नए दोस्त की वजह से पुराने दोस्त को नहीं छोड़ते।

Israel and Indian relationship

हाल ही में United Nation में भारत के स्थाई सदस्य T.S trimurti ने twitter पर भारत सरकार की तरफ से बयान जारी करते हुए कहा कि भारत सरकार किसी भी तरह की हिंसक गतिविधियों के खिलाफ है और दोनों देश से अपील करता है कि वह शांति कायम रखें। साथ ही उन्होंने गाजा क्षेत्र से हमास द्वारा इजराइल पर किए जा रहे हमले का भी विरोध किया ।
यहां आपको एक बात समझनी चाहिए कि हकीकत में इजरायल और फिलिस्तीन के बीच युद्ध नहीं बल्कि इजरायल और हमास ( जो कि एक आतंकवादी संगठन है ) उसके बीच है। यह साफ साफ संकेत है कि भारत सरकार आंशिक रूप से Israel के साथ जरूर खड़ा है।
इजराइल ने हमेसा से भारत की मदद बिना किसी शर्तों के खुले आम की है। चाहे वह 1971 पाकिस्तान हिंदुस्तान युद्ध हो, 1999 के कारगिल युद्ध हो या हाल ही में हुए बालाकोट एयर स्ट्राइक हो। आपको याद दिला दूं कि 1999 के कारगिल वॉर में जब अमेरिका ने GPS लोकेशन साझा करने से मना कर दिया था, तब इजराइल ने ही भारत को GPS इमेज उपलब्ध करवाए थे, साथ ही उन्होंने भारतीय सेना को अमेरिका के कई तरह के प्रतिबंधों के बावजूद laser guided missile उपलब्ध करवाए थे जिसने भारतीय सेना को कारगिल पर बढ़त बनाने में काफी ज्यादा मदद की थी। 2019 में जब पुलवामा अटैक की जवाबी कार्यवाही में Indian Air Force ने आतंकवादी संगठन जैश – ए – मोहम्मद के ठिकानों पर airstrike किए थे, उस में इस्तेमाल होने वाला बम spice 2000 इजराइल ने ही भारत को दिए हैं। इजराइल ने हमेशा भारत को खुले तौर पर समर्थन किया है, चाहे वह United Nation में Permanent membership को लेकर हो या कश्मीर मामले पर हो । इस वजह से कहीं ना कहीं यह जरूर लगता है कि भारत को इसराइल का समर्थन करना चाहिए ।

Foreign policy of India and diplomatic problems

भारत की हमेशा से foreign policy रही है कि वह किसी भी देश का समर्थन या विरोध खुले तौर पर नहीं करता। यह एक बहुत बड़ी समस्या है जिसके कारण भारत सरकार इजराइल का समर्थन नहीं कर सकती है।
आपको मैंने शुरुआत में ही बताया कि 1948 से पहले इजराइल नाम का कोई देश दुनिया के नक्शे में नहीं था। 1948 के बाद फिलिस्तीन के अधिकांश क्षेत्रों पर कब्जा करके इजराइल देश का स्थापना की गई है। इसके बाद भी अगर भारत सरकार इजराइल का समर्थन करती है तो अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में कई स्तरों पर फंस जाएगी ।
First:- आप सब जानते हैं कि कश्मीर मामला यूएन (united Nation) में है। जिसमें भारत हमेशा यह सवाल उठाते आया है कि पाकिस्तान ने हमारी जमीन पर कब्जा किया है, अगर भारत इजरायल द्वारा फिलिस्तीन के कब्जे की जमीन का समर्थन करता है तो फिर इस मामले पर यूएन में सवाल नहीं उठा पाएगा। साथ ही हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को भारत को घेरने के लिए एक मुद्दा मिल जाएगा ।

Second:- 1951 में चीन ने तिब्बत पर हमला करके उसे अपने में मिला लिया, साथ ही वह चीन सागर में हमेशा अपना दबदबा कायम करना चाहता है। यूनाइटेड नेशन में भारत हमेशा से चीन के खिलाफ रहा है, अगर इसके बाद भी भारत इजराइल का समर्थन करता है तो चीन भारत पर यूनाइटेड नेशन में इस बात को लेकर सवाल उठाएगा कि एक तरफ तो भारत हमारे द्वारा कब्जा किए क्षेत्रों का विरोध करता है, वहीं दूसरी तरफ इजराइल के साथ खड़ा मिलता है।

Third: – भारत हमेशा से यूनाइटेड नेशन में स्थाई सदस्यता चाहता है। जिसके लिए भारत को यूएन के 193 सदस्यों में से लगभग 130 देशों का समर्थन चाहिए। यूनाइटेड नेशन में मुस्लिम राष्ट्रों की संख्या 60 के करीब है तो अगर भारत इजराइल के समर्थन में खड़ा होता है तो कहीं ना कहीं मुस्लिम राष्ट्रों की भावनाओं को चोट लगेगा। भारत कभी नहीं चाहेगा कि यह मुस्लिम राष्ट्र हमारे खिलाफ रहे, इस वजह से भारत इजराइल का समर्थन खुले तौर पर नहीं कर सकता।

व्यापारिक समस्याएं: – भारत के export में इजराइल की हिस्सेदारी केवल 1% है, वहीं दूसरी तरफ अरब देशों को भारत 18% से ज्यादा सामान export करता है। इस वजह से भारत इजराइल का खुले तौर पर समर्थन करके, नहीं चाहेगा कि उसके व्यापारिक रिश्ते अरब देशों के साथ खराब हो ।

क्या मुस्लिम आबादी के दबाव में भारत सरकार इजराइल का समर्थन नहीं करती

Social media मैं आजकल एक बहस, यह भी हो रही है कि भारत सरकार मुस्लिम आबादी के दबाव में इजराइल का समर्थन नहीं करता। जो कि मुझे लगता है सरासर गलत है। क्योंकि आपको याद होगा जब भारत सरकार CAA और NRC लेकर आई थी, तो किस तरह पूरे देश में मुसलमानों ने भाजपा सरकार के खिलाफ उग्र प्रदर्शन किए थे, लेकिन इसके बाद भी भारत सरकार ने कानून को वापस नहीं लिया साथ ही पिछले साल जब फ्रांस के खिलाफ मुस्लिम आबादी ने देशभर में प्रदर्शन किए थे इसके बावजूद भी भारत सरकार फ्रांसिस के साथ खड़ी थी। यह दोनों उदाहरण इस बात को स्पष्ट करती है कि भारत सरकार कभी भी मुस्लिम आबादी के दबाव में नहीं आ सकती ।

अंत में इन सारे मामलों का अगर निष्कर्ष निकाले तो, भावनात्मक दृष्टिकोण से यह जरूर लगता है कि भारत को इसराइल का समर्थन खुलकर करना चाहिए , लेकिन अगर आप इस मामले को अंतरराष्ट्रीय और डिप्लोमेटिक तरीके से सोचे तो आपको लगेगा कि भारत की स्थिति इजरायल और फिलिस्तीन संघर्ष को लेकर उचित है।

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यह लेखक का अपना विचार है…

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Posted by ROHIT KUMAR

Written by – Aman roy sami

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